नाचहिं गावहिं बिबुध बधूटीं

चौपाई २, दोहा २६५ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

नाचहिं गावहिं बिबुध बधूटीं। बार बार कुसुमांजलि छूटीं॥ जहँ तहँ बिप्र बेदधुनि करहीं। बंदी बिरिदावलि उच्चरहीं॥ २ ॥

अर्थ

देवताओं की स्त्रियाँ नाचती-गाती हैं। बार-बार हाथों से पुष्पों की अंजलियाँ छूट रही हैं। जहाँ-तहाँ ब्राह्मण वेदध्वनि कर रहे हैं और भाट लोग विरुदावली (कुलकीर्ति) बखान रहे हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “जयमाल पहनाना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २६५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में धनुषभंग के बाद सीता द्वारा श्रीराम को जयमाल अर्पण और देवताओं की पुष्पवर्षा का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
जयमाल पहनाना