सीस जटा ससिबदनु सुहावा
सीस जटा ससिबदनु सुहावा
चौपाई ३, दोहा २६८ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सीस जटा ससिबदनु सुहावा। रिसबस कछुक अरुन होइ आवा॥ भृकुटी कुटिल नयन रिस राते। सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते॥ ३ ॥
अर्थ
सिर पर जटा है, सुन्दर मुखचन्द्र क्रोध के कारण कुछ लाल हो आया है। भौंहें टेढ़ी और आँखें क्रोध से लाल हैं। सहज ही देखते हैं, तो भी ऐसा जान पड़ता है मानो क्रोध कर रहे हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “जयमाल पहनाना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २६८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में धनुषभंग के बाद सीता द्वारा श्रीराम को जयमाल अर्पण और देवताओं की पुष्पवर्षा का वर्णन है।
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जयमाल पहनाना