रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी
रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी
चौपाई ४, दोहा १९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी। भामिनि भइहु दूध कइ माखी॥ जौं सुत सहित करहु सेवकाई। तौ घर रहहु न आन उपाई॥ ४ ॥
अर्थ
मैं यह बात लकीर खींचकर बलपूर्वक कहती हूँ, हे भामिनी! तुम तो अब दूध की मक्खी हो गयी! (जैसे दूध में पड़ी हुई मक्खी को लोग निकालकर फेंक देते हैं, वैसे ही तुम्हें भी लोग घर से निकाल बाहर करेंगे) जो पुत्रसहित [कौसल्या की] चाकरी बजाओगी तो घर में रह सकोगी; [अन्यथा घर में रहने का] दूसरा उपाय नहीं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना