कैकयसुता सुनत कटु बानी

चौपाई १, दोहा २० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

कैकयसुता सुनत कटु बानी। कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी॥ तन पसेउ कदली जिमि काँपी। कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी॥ १ ॥

अर्थ

कैकेयी मंथरा की कड़वी वाणी सुनते ही डरकर सूख गयी, कुछ बोल नहीं सकती। शरीर में पसीना आ गया और वह केले की तरह काँपने लगी। तब कुबरी (मंथरा) ने अपनी जीभ दाँतों तले दबायी (उसे भय हुआ कि कहीं भविष्य का अत्यन्त डरावना चित्र सुनकर कैकेयी के हृदय की गति न रुक जाय; जिससे उलटा सारा काम ही बिगड़ जाय)।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।

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सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना