नैहर जनमु भरब बरु जाई
नैहर जनमु भरब बरु जाई
चौपाई १, दोहा २१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
नैहर जनमु भरब बरु जाई। जिअत न करबि सवति सेवकाई॥ अरि बस दैउ जिआवत जाही। मरनु नीक तेहि जीवन चाही॥ १ ॥
अर्थ
मैं भले ही नैहर जाकर वहीं जीवन बिता दूँगी; पर जीते-जी सौत की चाकरी नहीं करूँगी। दैव जिसको शत्रु के वश में रखकर जिलाता है, उसके लिए तो जीने की अपेक्षा मरना ही अच्छा है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना