काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि

दोहा १४ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि। तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि॥ १४ ॥

अर्थ

कानों, लँगड़ों और कुबड़ों को कुटिल और कुचाली जानना चाहिए। उनमें भी स्त्री, और खासकर दासी! इतना कहकर भरतजी की माता कैकेयी मुसकरा दीं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का दोहा १४ है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना