सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी
सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी
चौपाई ४, दोहा १४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी। झुकी रानि अब रहु अरगानी॥ पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी। तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी॥ ४ ॥
अर्थ
मन्थरा के प्रिय वचन सुनकर, किंतु उसके मन की मैल जानकर रानी झुककर बोली—बस, अब चुप रह, घरफोड़ी कहीं की! जो फिर कभी ऐसा कहा तो तेरी जीभ पकड़कर निकलवा लूँगी।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।
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सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना