एकहिं बार आस सब पूजी

चौपाई १, दोहा १६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

एकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी॥ फोरै जोगु कपारु अभागा। भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा॥ १ ॥

अर्थ

सारी आशाएँ तो एक ही बार कहने में पूरी हो गयीं। अब तो दूसरी जीभ लगाकर कुछ कहूँगी। मेरा अभागा कपाल तो फोड़ने ही योग्य है, जो अच्छी बात कहने पर भी आपको दुःख होता है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।

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सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना