सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें
सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें
चौपाई २, दोहा १८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें। गरबित भरत मातु बल पी कें॥ सालु तुम्हार कौसिलहि माई। कपट चतुर नहिं होइ जनाई॥ २ ॥
अर्थ
[कौसल्या समझती है कि] और सब सौतें तो मेरी अच्छी तरह सेवा करती हैं, एक भरत की माँ पति के बल पर गर्वित रहती है! इसी से हे माई! कौसल्या को तुम बहुत ही साल (खटक) रही हो। किन्तु वह कपट करने में चतुर है; अतः उसके हृदय का भाव जानने में नहीं आता (वह उसे चतुराई से छिपाए रखती है)।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना