सुनत बात मृदु अंत कठोरी

चौपाई २, दोहा २२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनत बात मृदु अंत कठोरी। देति मनहुँ मधु माहुर घोरी॥ कहइ चेरि सुधि अहइ कि नाहीं। स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं॥ २ ॥

अर्थ

मंथरा की बातें सुनने में तो कोमल हैं, पर परिणाम में कठोर (भयानक) हैं। मानो वह शहद में घोलकर ज़हर पिला रही हो। दासी कहती है--हे स्वामिनि! तुमने मुझको एक कथा कही थी, उसकी याद है कि नहीं ?

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।

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सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना