हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें
हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें
चौपाई ४, दोहा १३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें। दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें॥ तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि। छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि॥ ४ ॥
अर्थ
रानी हँसकर कहने लगी कि तेरे बड़े गाल हैं (तू बहुत बढ़-बढ़कर बोलने वाली है)। मेरा मन कहता है कि लक्ष्मण ने तुझे कुछ सीख दी है (दण्ड दिया है)। तब भी वह महापापिनी दासी कुछ भी नहीं बोलती। ऐसी लंबी साँस छोड़ रही है, मानो काली नागिन [फुफकार छोड़ रही] हो।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।
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सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना