भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन
भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन
चौपाई २, दोहा १४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन॥ देखहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा॥ २ ॥
अर्थ
आज कौसल्या को विधाता बहुत ही दाहिने (अनुकूल) हुए हैं; यह देखकर उनके हृदय में गर्व समाता नहीं। तुम स्वयं जाकर सब शोभा क्यों नहीं देख लेतीं, जिसे देखकर मेरे मन में क्षोभ हुआ है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।
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सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना