तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ

चौपाई २, दोहा १७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ। धरेहु मोर घरफोरी नाऊँ॥ सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली। अवध साढ़साती तब बोली॥ २ ॥

अर्थ

तुम पूछती हो, किंतु मैं कहते डरती हूँ। क्योंकि तुमने पहले ही मेरा नाम घरफोड़ी रख दिया है। बहुत तरह से गढ़-छोलकर, खूब विश्वास जमाकर, तब वह अयोध्या की साढ़साती बोली--।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।

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सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना