जारै जोगु सुभाउ हमारा
जारै जोगु सुभाउ हमारा
चौपाई ४, दोहा १६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
जारै जोगु सुभाउ हमारा। अनभल देखि न जाइ तुम्हारा॥ तातें कछुक बात अनुसारी। छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी॥ ४ ॥
अर्थ
हमारा स्वभाव तो जलाने ही योग्य है। क्योंकि तुम्हारा अहित मुझसे देखा नहीं जाता। इसीलिये कुछ बात चलायी थी। किन्तु हे देवि! हमारी बड़ी भूल हुई, क्षमा करो।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।
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सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना