राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी

चौपाई ३, दोहा १८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी। सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी॥ रचि प्रपंचु भूपहि अपनाई। राम तिलक हित लगन धराई॥ ३ ॥

अर्थ

राजा का तुम पर विशेष प्रेम है। कौसल्या सौत के स्वभाव से उसे देख नहीं सकती। इसीलिये उसने जाल रचकर राजाको अपने वश में करके [भरत की अनुपस्थितिमें] राम के राजतिलक के लिये लग्न निश्चय करा लिया।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।

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सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना