कुबरीं करि कबुली कैकेई
कुबरीं करि कबुली कैकेई
चौपाई १, दोहा २२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
कुबरीं करि कबुली कैकेई। कपट छुरी उर पाहन टेई॥ लखइ न रानि निकट दुखु कैसें। चरइ हरित तिन बलिपसु जैसें॥ १ ॥
अर्थ
कुबरी ने कैकेयी को [सब तरह से] कबूल करवाकर (अर्थात् बलिपशु बनाकर) कपटरूप छुरी को अपने [कठोर] हृदयरूपी पत्थर पर टेई (उसकी धार को तेज किया)। रानी कैकेयी अपने निकट के (शीघ्र आने वाले) दुःख को कैसे नहीं देखती, जैसे बलि का पशु हरी-हरी घास चरता है [पर यह नहीं जानता कि मौत सिर पर नाच रही है]।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।
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सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना