दुइ बरदान भूप सन थाती
दुइ बरदान भूप सन थाती
चौपाई ३, दोहा २२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
दुइ बरदान भूप सन थाती। मागहु आजु जुड़ावहु छाती॥ सुतहि राजु रामहि बनबासू। देहु लेहु सब सवति हुलासू॥ ३ ॥
अर्थ
तुम्हारे दो वरदान राजा के पास धरोहर हैं। आज उन्हें राजा से माँगकर अपनी छाती ठंढी करो। पुत्र को राज्य और राम को वनवास दो और सौत का सारा आनन्द तुम ले लो।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।
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सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना