भावी बस प्रतीति उर आई
भावी बस प्रतीति उर आई
चौपाई १, दोहा १९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
भावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई॥ का पूँछहु तुम्ह अबहुँ न जाना। निज हित अनहित पसु पहिचाना॥ १ ॥
अर्थ
होनहार वश कैकेयी के मन में विश्वास हो गया। रानी फिर सौगन्ध दिलाकर पूछने लगी। [मन्थरा बोली--] क्या पूछती हो? अरे, तुमने अब भी नहीं समझा? अपने भले-बुरे को (अथवा मित्र-शत्रु को) तो पशु भी पहचान लेते हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना