तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज

दोहा १७ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ। मन मलीन मुह मीठ नृपु राउर सरल सुभाउ॥ १७ ॥

अर्थ

तुमको अपने सुहाग के [झूठे] बल पर कुछ भी सोच नहीं है; राजाको अपने वश में जानती हो। किन्तु राजा मन के मैले और मुँह के मीठे हैं! और आपका सीधा स्वभाव है (आप कपट-चतुराई जानती ही नहीं)।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का दोहा १७ है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।

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सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना