कहि कहि कोटिक कपट कहानी
कहि कहि कोटिक कपट कहानी
चौपाई २, दोहा २० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
कहि कहि कोटिक कपट कहानी। धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी॥ फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली। बकिहि सराहइ मानि मराली॥ २ ॥
अर्थ
फिर कपट की करोड़ों कहानियाँ कह-कहकर उसने रानी को खूब समझाया कि धीरज रखो! कैकेयी का भाग्य पलट गया, उसे कुचाल प्यारी लगी। वह बगुली को हंसिनी मानकर (वैरिण को हित मानकर) उसकी सराहना करने लगी।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।
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सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना