सुनु मंथरा बात फुरि तोरी

चौपाई ३, दोहा २० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनु मंथरा बात फुरि तोरी। दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी॥ दिन प्रति देखउँ राति कुसपने। कहउँ न तोहि मोह बस अपने॥ ३ ॥

अर्थ

कैकेयी ने कहा--मंथरा! सुन, तेरी बात सत्य है। मेरी दाहिनी आँख नित्य फड़का करती है। मैं प्रतिदिन रात को बुरे स्वप्न देखती हूँ; किन्तु अपने मोहवश तुझसे कहती नहीं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।

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सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना