गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय

दोहा १६ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि। सुरमाया बस बैरिनिहि सुहृद जानि पतिआनि॥ १६ ॥

अर्थ

अधरबुद्धि रानी कैकेयी ने देवताओं की माया के वश होकर रहस्ययुक्त कपटभरे प्रिय वचनों को सुनकर बैरिन मन्थरा को अपनी सुहृद् (अहैतुक हित करनेवाली) जानकर उसका विश्वास कर लिया।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का दोहा १६ है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।

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सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना