जेहिं राउर अति अनभल ताका
जेहिं राउर अति अनभल ताका
चौपाई ३, दोहा २१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
जेहिं राउर अति अनभल ताका। सोइ पाइहि यहु फलु परिपाका॥ जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनि। भूख न बासर नीद न जामिनि॥ ३ ॥
अर्थ
जिसने तुम्हारी बुराई चाही है, वही परिणाम में यह फल पायेगा। हे स्वामिनि! मैंने जब से यह कुमत सुना है, तब से मुझे न तो दिन में कुछ भूख लगती है और न रात में नींद ही आती है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सरस्वती द्वारा मंथरा की बुद्धि फेरना और कैकेयी को वरदान माँगने के लिए उकसाने का वर्णन है।
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सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना