करि केहरि कपि कोल कुरंगा

चौपाई १, दोहा १३८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

करि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा॥ फिरत अहेर राम छबि देखी। होहिं मुदित मृगबृंद बिसेषी॥ १ ॥

अर्थ

हाथी, सिंह, बंदर, सूअर और हिरन-ये सब वैर छोड़कर साथ-साथ विचरते हैं। शिकार के लिये फिरते हुए श्रीरामचन्द्रजी की छबि को देखकर पशुओं के समूह विशेष आनन्दित होते हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों द्वारा सेवा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १३८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चित्रकूट में श्रीराम के निवास और कोल-भीलों की प्रेमपूर्ण सेवा का वर्णन है।

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चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों द्वारा सेवा