बरषि सुमन कह देव समाजू
बरषि सुमन कह देव समाजू
चौपाई २, दोहा १३४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू॥ करि बिनती दुख दुसह सुनाए। हरषित निज निज सदन सिधाए॥ २ ॥
अर्थ
फूलों की वर्षा करके देवसमाज ने कहा--हे नाथ! आज [आपका दर्शन पाकर] हम सनाथ हो गये। फिर विनती करके उन्होंने अपने दुःसह दुःख सुनाये और [दुःखों के नाश का आश्वासन पाकर] हर्षित होकर अपने-अपने स्थानों को चले गये।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों द्वारा सेवा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चित्रकूट में श्रीराम के निवास और कोल-भीलों की प्रेमपूर्ण सेवा का वर्णन है।
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चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों द्वारा सेवा