सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन
सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन
चौपाई २, दोहा १३९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन। मंगलमय अति पावन पावन॥ महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू। सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू॥ २ ॥
अर्थ
वह वन और पर्वत स्वभाव से सुहावने, मंगलमय और अत्यन्त पावन हैं। उसकी महिमा किस प्रकार कही जाय, जहाँ सुख-सागर ने निवास किया है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों द्वारा सेवा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १३९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चित्रकूट में श्रीराम के निवास और कोल-भीलों की प्रेमपूर्ण सेवा का वर्णन है।
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चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों द्वारा सेवा