नहिं तृन चरहिं न पिअहिं जलु
नहिं तृन चरहिं न पिअहिं जलु
दोहा १४२ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
नहिं तृन चरहिं न पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि। ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि॥ १४२ ॥
अर्थ
वे न तो घास चरते हैं, न पानी पीते हैं। केवल आँखों से जल बहा रहे हैं। श्रीरामचन्द्रजी के घोड़ों को इस दशा में देखकर सब निषाद व्याकुल हो गये।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों द्वारा सेवा” प्रकरण का दोहा १४२ है। इस प्रकरण में चित्रकूट में श्रीराम के निवास और कोल-भीलों की प्रेमपूर्ण सेवा का वर्णन है।
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चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों द्वारा सेवा