नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी
नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी
चौपाई २, दोहा १४० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी॥ सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा॥ २ ॥
अर्थ
स्वामी का प्रेम अपने प्रति नित्य बढ़ता हुआ देखकर सीताजी ऐसी हर्षित रहती हैं जैसे दिन में चकवी! सीताजी का मन श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में अनुरक्त है; इससे उनको वन हजारों अवध के समान प्रिय लगता है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों द्वारा सेवा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १४० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चित्रकूट में श्रीराम के निवास और कोल-भीलों की प्रेमपूर्ण सेवा का वर्णन है।
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चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों द्वारा सेवा