जोगवहिं प्रभु सिय लखनहि कैसें
जोगवहिं प्रभु सिय लखनहि कैसें
चौपाई १, दोहा १४२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
जोगवहिं प्रभु सिय लखनहि कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें॥ सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि॥ १ ॥
अर्थ
प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सीताजी और लक्ष्मणजी की कैसी सँभाल रखते हैं, जैसे पलकें नेत्रों के गोलकों की। इधर लक्ष्मणजी श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजी की [अथवा लक्ष्मणजी और सीताजी श्रीरामचन्द्रजी की] ऐसी सेवा करते हैं जैसे अज्ञानी मनुष्य शरीर की करते हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों द्वारा सेवा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १४२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चित्रकूट में श्रीराम के निवास और कोल-भीलों की प्रेमपूर्ण सेवा का वर्णन है।
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चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों द्वारा सेवा