एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी
एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी
चौपाई २, दोहा १४२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी॥ कहेउँ राम बन गवनु सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा॥ २ ॥
अर्थ
पक्षी, मृग, देवता और तपस्वियों के हितकारी प्रभु इस प्रकार सुखपूर्वक वन में निवास कर रहे हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—मैंने श्रीरामचन्द्रजी का सुन्दर वन-गमन कहा। अब जिस तरह सुमन्त्र अयोध्या में आये वह [कथा] सुनो।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों द्वारा सेवा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १४२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चित्रकूट में श्रीराम के निवास और कोल-भीलों की प्रेमपूर्ण सेवा का वर्णन है।
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चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों द्वारा सेवा