धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे
धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे
चौपाई ३, दोहा २०६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे। दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे॥ आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे। चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे॥ ३ ॥
अर्थ
दौड़कर उन्हें उठाया, हृदय से लगा लिया। आशीर्वाद दिया और कृतार्थ किया। आसन दिया। सिर नवाकर वे इस तरह बैठे मानो भागकर संकोच के घर में घुस जाना चाहते हों।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २०६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का प्रयाग तीर्थ दर्शन और महर्षि भरद्वाज से भक्तिपूर्ण संवाद का वर्णन है।
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भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद