यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ

चौपाई १, दोहा २०७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेदु बुध संमत दोऊ॥ तात तुम्हार बिमल जसु गाई। पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई॥ १ ॥

अर्थ

यह कहना भी कोई भला न कहेगा, क्योंकि लोक और वेद दोनों ही विद्वानों को मान्य है। किन्तु हे तात! तुम्हारा निर्मल यश गाकर तो लोक और वेद दोनों बड़ाई पावेंगे।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २०७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का प्रयाग तीर्थ दर्शन और महर्षि भरद्वाज से भक्तिपूर्ण संवाद का वर्णन है।

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भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद