आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू
आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू
चौपाई २, दोहा २०३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू। सुमिरे लखन सहित सिय रामू॥ गवने भरत पयादेहिं पाए। कोतल संग जाहिं डोरिआए॥ २ ॥
अर्थ
तदनन्तर आप (भरतजी) ने सुरसरि को प्रणाम किया और लक्ष्मण सहित श्रीसीतारामजी का स्मरण किया। भरतजी पैदल ही चले। उनके साथ कोतल बागडोर से बँधे हुए चल रहे हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २०३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का प्रयाग तीर्थ दर्शन और महर्षि भरद्वाज से भक्तिपूर्ण संवाद का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद