कोक तिलोक प्रीति अति करिही
कोक तिलोक प्रीति अति करिही
चौपाई २, दोहा २०९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही॥ निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू॥ २ ॥
अर्थ
त्रैलोक्यरूपी चकवा इस यशरूपी चन्द्रमा पर अत्यन्त प्रेम करेगा और प्रभु श्रीरामचन्द्रजी का प्रतापरूपी सूर्य इसकी छवि को हरण नहीं करेगा। यह चन्द्रमा रात-दिन सदा सब किसी को सुख देनेवाला होगा। कैकेयी का कुकर्मरूपी राहु इसे ग्रास नहीं करेगा।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २०९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का प्रयाग तीर्थ दर्शन और महर्षि भरद्वाज से भक्तिपूर्ण संवाद का वर्णन है।
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भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद