जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ

चौपाई २, दोहा २०५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ॥ चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़ें प्रेमु सब भाँति भलाई॥ २ ॥

अर्थ

मेघ चाहे जन्म भर चातक की सुधि भुला दे और जल माँगने पर वह चाहे वज्र और पत्थर ही बरसाए, पर चातक की रट घटने से तो उसकी बात ही घट जाएगी। उसकी तो प्रेम बढ़ने में ही सब तरह से भलाई है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २०५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का प्रयाग तीर्थ दर्शन और महर्षि भरद्वाज से भक्तिपूर्ण संवाद का वर्णन है।

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भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद