नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू
नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू
चौपाई ३, दोहा २११ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू। पितहु मरन कर मोहि न सोकू॥ सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए। लछिमन राम सरिस सुत पाए॥ ३ ॥
अर्थ
न यही डर है कि मेरा परलोक बिगड़ जायगा और न पिताजी के मरने का ही मुझे शोक है। क्योंकि उनका सुन्दर पुण्य और सुयश भुवनभर में सुशोभित है। उन्होंने श्रीराम-लक्ष्मण-सरीखे पुत्र पाये।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का प्रयाग तीर्थ दर्शन और महर्षि भरद्वाज से भक्तिपूर्ण संवाद का वर्णन है।
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भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद