तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू

चौपाई ४, दोहा २०५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू। राम चरन अनुराग अगाधू॥ बादि गलानि करहु मन माहीं। तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं॥ ४ ॥

अर्थ

हे तात भरत! तुम सब प्रकार से साधु हो। श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में तुम्हारा अथाह प्रेम है। तुम व्यर्थ ही मन में ग्लानि कर रहे हो। श्रीरामचन्द्र को तुम्हारे समान प्रिय कोई नहीं है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २०५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का प्रयाग तीर्थ दर्शन और महर्षि भरद्वाज से भक्तिपूर्ण संवाद का वर्णन है।

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भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद