सुनहु भरत रघुबर मन माहीं
सुनहु भरत रघुबर मन माहीं
चौपाई २, दोहा २०८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनहु भरत रघुबर मन माहीं। पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं॥ लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती॥ २ ॥
अर्थ
हे भरत! सुनो, श्रीरघुबर के मन में तुम्हारे समान प्रेमपात्र दूसरा कोई नहीं है। लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी को सारी रात तुम्हारी अत्यन्त प्रेम के साथ सराहना करते ही बीती।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २०८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का प्रयाग तीर्थ दर्शन और महर्षि भरद्वाज से भक्तिपूर्ण संवाद का वर्णन है।
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भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद