तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि
तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि
दोहा २०५ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल। भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल॥ २०५ ॥
अर्थ
त्रिवेणीजी के अनुकूल वचन सुनकर भरतजी का शरीर पुलकित हो गया, हृदय में हर्ष छा गया। भरत धन्य हैं, धन्य हैं, कहकर देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद” प्रकरण का दोहा २०५ है। इस प्रकरण में भरतजी का प्रयाग तीर्थ दर्शन और महर्षि भरद्वाज से भक्तिपूर्ण संवाद का वर्णन है।
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भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद