कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें
कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें
चौपाई ३, दोहा २०५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें॥ भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी। भइ मृदु बानि सुमंगल देनी॥ ३ ॥
अर्थ
जैसे तपाने से सोने में चमक आ जाती है, वैसे ही प्रियतम के चरणों में नियम निबाहने से प्रेमी सेवक का गौरव बढ़ जाता है। भरतजी के वचन सुनकर बीच त्रिवेणी से कोमल, सुमंगल देनेवाली वाणी हुई।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २०५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का प्रयाग तीर्थ दर्शन और महर्षि भरद्वाज से भक्तिपूर्ण संवाद का वर्णन है।
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भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद