नव बिधु बिमल तात जसु तोरा
नव बिधु बिमल तात जसु तोरा
चौपाई १, दोहा २०९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा॥ उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना॥ १ ॥
अर्थ
है तात! तुम्हारा यश निर्मल नवीन चन्द्रमा है और श्रीरामचन्द्रजी के दास कुमुद और चकोर हैं [वह चन्द्रमा तो प्रतिदिन अस्त होता और घटता है, जिससे कुमुद और चकोर को दुःख होता है]; परन्तु यह तुम्हारा यशरूपी चन्द्रमा सदा उदय रहेगा; कभी अस्त होगा ही नहीं। जगद्रूपी आकाश में यह घटेगा नहीं, वरन् दिन-दिन दूना होगा।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २०९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का प्रयाग तीर्थ दर्शन और महर्षि भरद्वाज से भक्तिपूर्ण संवाद का वर्णन है।
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भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद