तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ

चौपाई २, दोहा २११ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ। उर अंतरजामी रघुराऊ॥ मोहि न मातु करतब कर सोचू। नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू॥ २ ॥

अर्थ

मैं सच्चे भाव से कहता हूँ। आप सर्वज्ञ हैं, और श्रीरघुनाथजी हृदय के भीतर की जाननेवाले हैं (मैं कुछ भी असत्य कहूँगा तो आपसे और उनसे छिपा नहीं रह सकता)। मुझे माता कैकेयी की करनी का कुछ भी सोच नहीं है। और न मेरे मन में इसी बात का दुःख है कि जगत् मुझे नीच समझेगा।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का प्रयाग तीर्थ दर्शन और महर्षि भरद्वाज से भक्तिपूर्ण संवाद का वर्णन है।

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भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद