जानहुँ रामु कुटिल करि मोही

चौपाई १, दोहा २०५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही॥ सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें॥ १ ॥

अर्थ

स्वयं श्रीरामचन्द्रजी भी भले ही मुझे कुटिल समझें और लोग मुझे गुरु तथा साहिब का द्रोही भले ही कहें; पर श्रीसीतारामजी के चरणों में मेरा प्रेम आपकी कृपा से दिन-दिन बढ़ता ही रहे।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २०५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का प्रयाग तीर्थ दर्शन और महर्षि भरद्वाज से भक्तिपूर्ण संवाद का वर्णन है।

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भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद