राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू

चौपाई ४, दोहा २११ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू। भूप सोच कर कवन प्रसंगू॥ राम लखन सिय बिनु पग पनहीं। करि मुनि बेष फिरहिं बन बनहीं॥ ४ ॥

अर्थ

फिर जिन्होंने श्रीरामचन्द्रजी के विरह में अपने क्षणभंगुर शरीर को त्याग दिया, ऐसे राजा के लिये सोच करने का कौन प्रसंग है? [सोच इसी बात की है कि] श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी पैरों में बिना जूती के मुनियों का वेष बनाये वन-वन में फिरते हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरतजी का प्रयाग तीर्थ दर्शन और महर्षि भरद्वाज से भक्तिपूर्ण संवाद का वर्णन है।

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भरतजी का प्रयाग, भरद्वाज से संवाद