जगत पिता रघुपतिहि बिचारी
जगत पिता रघुपतिहि बिचारी
चौपाई २, दोहा २४६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जगत पिता रघुपतिहि बिचारी। भरि लोचन छबि लेहु निहारी॥ सुंदर सुखद सकल गुन रासी। ए दोउ बंधु संभु उर बासी॥ २ ॥
अर्थ
और श्रीरघुनाथजी को जगत् का पिता (परमेश्वर) विचारकर, नेत्र भरकर उनकी छबि देख लो [ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलेगा]। सुन्दर, सुख देनेवाले और समस्त गुणों की राशि ये दोनों भाई शिवजी के हृदय में बसनेवाले हैं (स्वयं शिवजी भी जिन्हें सदा हृदय में छिपाये रखते हैं, वे तुम्हारे नेत्रों के सामने आ गये हैं)।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २४६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विश्वामित्र के साथ यज्ञशाला में श्रीराम-लक्ष्मण के प्रवेश और सभा के विविध भावमय दर्शन का वर्णन है।
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विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश