राज समाज बिराजत रूरे
राज समाज बिराजत रूरे
चौपाई २, दोहा २४१ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
राज समाज बिराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे॥ जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥ २ ॥
अर्थ
वे राजाओं के समाज में ऐसे सुशोभित हो रहे हैं, मानो तारागणों के बीच दो पूर्ण चन्द्रमा हों। जिनकी जैसी भावना थी, प्रभु की मूर्ति उन्होंने वैसी ही देखी।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २४१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विश्वामित्र के साथ यज्ञशाला में श्रीराम-लक्ष्मण के प्रवेश और सभा के विविध भावमय दर्शन का वर्णन है।
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विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश