गिरा मुखर तन अरध भवानी
चौपाई ३, दोहा २४७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
गिरा मुखर तन अरध भवानी। रति अति दुखित अतनु पति जानी॥ बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही। कहिअ रमासम किमि बैदेही॥ ३ ॥
अर्थ
[पृथ्वी की स्त्रियों की तो बात ही क्या, देवताओं की स्त्रियों को भी यदि देखा जाय तो हमारी अपेक्षा कहीं अधिक दिव्य और सुन्दर हैं, तो उनमें] सरस्वती तो बहुत बोलनेवाली हैं; पार्वती अर्द्धांगिनी हैं (अर्थात् अर्द्ध-नारीनटेश्वर के रूप में उनका आधा ही अंग स्त्री का है, शेष आधा अंग पुरुष--शिवजी का है), कामदेव की स्त्री रति पतिको बिना शरीर का (अनंग) जानकर बहुत दुखी रहती है और जिनके विष और बारुनी-जैसे [समुद्र से उत्पन्न होने के नाते] प्रिय भाई हैं, उन लक्ष्मी के समान तो जानकीजी को कहा ही कैसे जाय।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २४७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विश्वामित्र के साथ यज्ञशाला में श्रीराम-लक्ष्मण के प्रवेश और सभा के विविध भावमय दर्शन का वर्णन है।