चितवनि चारु मार मनु हरनी
चितवनि चारु मार मनु हरनी
चौपाई २, दोहा २४३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
चितवनि चारु मार मनु हरनी। भावति हृदय जाति नहिं बरनी॥ कल कपोल श्रुति कुंडल लोला। चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला॥ २ ॥
अर्थ
सुन्दर चितवन [सारे संसार के मन को हरनेवाली] कामदेव के भी मन को हरनेवाली है। वह हृदय को बहुत ही प्यारी लगती है, पर उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। सुन्दर गाल हैं, कानों में चञ्चल कुण्डल हैं। ठोड़ी और अधर (ओठ) सुन्दर हैं, कोमल वाणी है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २४३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विश्वामित्र के साथ यज्ञशाला में श्रीराम-लक्ष्मण के प्रवेश और सभा के विविध भावमय दर्शन का वर्णन है।
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विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश