बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला
बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला
चौपाई २, दोहा २४५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला। मेलिहि सीय राम उर माला॥ अस बिचारि गवनहु घर भाई। जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई॥ २ ॥
अर्थ
[इधर उनके रूप को देखकर सबके मन में यह निश्चय हो गया कि] शिवजी के विशाल धनुष को [जो सम्भव है न टूट सके] बिना तोड़े भी सीताजी श्रीरामचन्द्रजी के ही गले में जयमाल डालेंगी (अर्थात् दोनों तरह से ही हमारी हार होगी और विजय श्रीरामचन्द्रजी के हाथ रहेगी)। [यों सोचकर वे कहने लगे--] हे भाई! ऐसा विचारकर यश, प्रताप, बल और तेज गँवाकर अपने-अपने घर चलो।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २४५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विश्वामित्र के साथ यज्ञशाला में श्रीराम-लक्ष्मण के प्रवेश और सभा के विविध भावमय दर्शन का वर्णन है।
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विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश