उर अनुभवति न कहि सक सोऊ

चौपाई ४, दोहा २४२ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

उर अनुभवति न कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ॥ एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ॥ ४ ॥

अर्थ

उस (स्नेह और सुख) का वे हृदय में अनुभव कर रही हैं, पर वे भी उसे कह नहीं सकतीं। फिर कोई कवि उसे किस प्रकार कह सकता है। इस प्रकार जिसका जैसा भाव था, उसने कोसलाधीश श्रीरामचन्द्रजी को वैसा ही देखा।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २४२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विश्वामित्र के साथ यज्ञशाला में श्रीराम-लक्ष्मण के प्रवेश और सभा के विविध भावमय दर्शन का वर्णन है।

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विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश